
दिव्य अनुभूति का एहसास कराती चर्चित किताब दिव्यधाम नानकसागर
पिथौरा की पुण्य भूमि से प्रख्यात साहित्यकार और इतिहास अन्वेषक डॉ. शिवशंकर पटनायक द्वारा रचित पुस्तक दिव्यधाम नानकसागर का प्रकाशन निःसंदेह छत्तीसगढ़ वासियों के लिए एक गौरवपूर्ण क्षण है तथा लेखक और उनके सहयोगियों के लिए एक बड़ी उपलब्धि भी है।
वैसे तो सिक्ख धर्म के संस्थापक और प्रथम गुरु नानक देव के जीवन चरित्र पर कई ऐतिहासिक धार्मिक ग्रंथो का प्रकाशन हो चुका है। हमारे सुधि पाठक उसका अध्ययन कर चुके है तदापि डॉ. शिवशंकर पटनायक द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य के विशेष संदर्भ में उनका दृष्टिकोण एक नया आयाम में झलकता है। उनके द्वारा लिखित पुस्तक दिव्य धाम नानक सागर इसी कारण विशेष सुर्खियों में बनी है जो लाज़मी भी है।
अच्छी तरह से लिखी गई क्रमबद्ध पुस्तक ऐसे सरल ढंग से अपना संदेश देती है जो सबको अच्छा लगता है। सैकड़ों वर्षों से हम गुरूनानक देव जी के और सिक्ख धर्म के सभी धार्मिक ग्रंथों को पढ़ते आ रहे हैं। श्री गुरुनानक जी की महिमा को सुनते आ रहे है। गुरूनानक जी के जीवन यात्रा पर आधारित नवीनतम पुस्तक दिव्य धाम नानकसागर का नाम आते ही हमारे हृदय में एक विचारशक्ति उत्पन्न होकर श्रद्धा भक्ति और आस्था के रूप में रूपांतरित हो जाती है।
पुस्तक के प्रथम चरण में प्रकाशक रजिन्दर खनूजा, लेखक डॉ. शिवशंकर पटनायक, खोजकर्ता रिंकु ओबेराय, संपादक के.पी. साहू एवं अन्य विशिष्ठ लोगों ने शुभकामना के जरिये अपने विचारों को उल्लेखित किया है। पुस्तक के लेखक डॉ. शिवशंकर पटनायक अपने उम्र के 83वें पड़ाव में पूरे मनोयोग से तल्लीनतापूर्वक गुरूनानक देव जी के जीवन दर्शन का जीवंत चित्रण किया है। छत्तीसगढ़ राज्य के विशेष संदर्भ में गुरूनानक जी के ऐतिहासिक यात्रा पर लिखी गई छत्तीसगढ़ राज्य की यह पहली पुस्तक है जिसको लिखने का सौभाग्य पिथौरा निवासी डॉ. शिवशंकर पटनायक को मिला है। लेखक शिवशंकर पटनायक ने ग्राम गढ़फुलझर एवं नानकसागर शिवरीनारायण जेवरा लीलेसर पिथौरा के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए सांस्कृतिक एवं पुरातन धरोहरों को सहेजने के लिए एक प्रयास भी किया है। विषय वस्तु के क्रम में मंझला राजा सागरचंद भयना, बंजारा समाज के पितृ पुरुष मख्खन शाह, लक्कीराम बंजारा, भाई मर्दाना जी, भाई बाला जी संधु के जीवन प्रसंग सहित पंजाब की तत्कालिन परिस्थितियों, पंजाब में भक्ति आंदोलन और गुरूनानक जी से संबंधित प्रेरक घटनाओं का सचित्र सजीव चित्रण कर अपनी विद्वता का परिचय भी दिया है।
पुस्तक सृजन करते समय कुछ बातें छूट जाती है कुछ बातें जुड़ जाती है और कुछ बढ़ा चढ़ा कर कह दी जाती है किन्तु पटनायक जी ने सारगर्मित स्त्रोत ग्रंथों के जरिए अपनी बात को सच्चाई के साथ रखी है। पुस्तक का महत्व उसकी मौलिकता या इस बात का नहीं है कि किसी पुस्तक में बयान की गई घटना वास्तव में घटी है या नहीं। किसी संत ने कोई विशेष बात की थी या नहीं, कोई करामात वास्तव में हुई थी या नहीं। महत्व तो पुस्तक में दी गई शिक्षा और संदेश का है। संत महात्मा अपने ज्ञान अनुभव का इस्तेमाल हमे अपना खास संदेश देने के लिए करते है। उनकी शिक्षा को लोगों तक पंहुचाने का साघन है ताकि पाठक उनकी गूढ़ रहस्य और ज्ञान की बातों को आसानी से समझ सके।
पुस्तक पढ़ते समय हमारे मन पर इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से पढ़ता है और जो बातें पहले हम महिनों अध्ययन और तर्क द्वारा नहीं समझ पाते वही बात पलक झपकते ही हमारी समझ में आ जाती है और हम हालात को निष्पक्ष भाव से देखना शुरू कर देते है। यही इस पुस्तक की एक अनूठी विशेषता है जो पढ़ते समय एक दिव्य कृपा के रूप में होता है। पुस्तक पठन के दौरान हम उनकी दिव्य कृपा से सराबोर हो उठते हैं । एक दिव्य अनुभूति का अहसास कराती है दिव्य धाम नानकसागर। धार्मिक ग्रंथों की दृष्टि से यह केवल एक पुस्तक नहीं है बल्कि एक जीवित गुरु की एक जीवित आत्मा है जो एक लौ के रूप में हमारे आस-पास दृष्टिगोचर होती है। जिस दृष्टिकोण से इस पुस्तक का प्रकाशन प्रकाशक रजिन्दर खनूजा द्वारा खोज कर्ताओं के माध्यम से किया गया है। उनका प्रयास सार्थक साबित हुआ है। छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक धार्मिक ग्रंथ के रूप में यह पुस्तक आनें वाली भावी पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगी। उनके अंदर एक अलौकिक आमा भरेगी। ऐसी उम्मीद मुझे है।
पुस्तक परिचय दिव्य धाम नानक सागर
लेखक शिवशंकर पटनायक प्रकाशक राजिंदर खनूजा
खोजकर्ता अमृतपाल सिंह ओबेरॉय संपादक के.पी.साहू
पुस्तक आवरण का चित्र भाग 1
समीक्षक
बीजू पटनायक श्री एन.पी. स्मृति फाउंडेशन पिथौरा जिला महासमुंद (छ.ग.) मो नं 8223024372







